आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा


आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ............

जनकवि स्व .विपिन 'मणि '

Friday, November 28, 2008

मुक्तक


छुपाओ मत जमाने को सुलगते बाग़ दिखने दो
दिलों में आग है तो फ़िर दिलों की आग दिखने दो
हकीकत अब सभी की सामने आनी जरूरी है
कहाँ बेदाग है दामन कहाँ पे दाग दिखने दो

3 comments:

कंचन सिंह चौहान said...

ha.n sach kaha....ab sab satyata dikhani hi chahiye

Akshaya-mann said...

bahut khub //
wo baag....dilon mei lagti aag ...
wo haqiqat jaladi saamne aayegi.....
wo daag bhi jaroor dikhainge.....
samporn hain ye shabd is chote se muktak mei.........

एक दर्पण,दो पहलू और ना जाने कितने नजरिये /एक सिपाही और एक अमर शहीद का दर्पण और एक आवाज
अक्षय,अमर,अमिट है मेरा अस्तित्व वो शहीद मैं हूं
मेरा जीवित कोई अस्तित्व नही पर तेरा जीवन मैं हूं
पर तेरा जीवन मैं हूं

अक्षय-मन

Dev said...

छुपाओ मत जमाने को सुलगते बाग़ दिखने दो
दिलों में आग है तो फ़िर दिलों की आग दिखने दो

Nice , very nice
Gaharai hai aapke mukatqak me..
Regards