आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा


आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ............

जनकवि स्व .विपिन 'मणि '

Tuesday, December 2, 2008

हमने तुमको दिल्ली दी थी ,हमको दिल्ली वापस दो

सारा बचपन ,खेल खिलौने , चिल्ला-चिल्ली वापस दो
छोडो तुम मैदान हमारा , डन्डा - गिल्ली वापस दो
ऐसी - वैसी चीजें देकर ,अब हमको बहलाओ मत
हमने तुमको दिल्ली दी थी ,हमको दिल्ली वापस दो

डा. उदय ’मणि’

3 comments:

Akshaya-mann said...

acchh vyang kiya hai..andaaz accha hai.....

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

vaah kya joradaar baat kahi hai.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सवाल जोरदार है। पर किस से है? और जवाब कौन देगा?