आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा


आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ............

जनकवि स्व .विपिन 'मणि '

Wednesday, November 5, 2008

दो- मुक्तक

सभी के सामने दलदल को, जो दलदल बताता है
जमाना आजकल उसको, बड़ा पागल बताता है
किसी की याद ने काफ़ी , रुलाया है तुम्हें शायद
तुम्हारी आँख का फैला , हुआ काजल बताता है

एवं
नहीं है चीज़ रखने की ,जो बच्चे साथ रखते हैं
खिलौनो के दिनो मे बम , तमन्चे साथ रखते हैं
कहीं बचपन न खो जाए हमारा इसलिए हम तो
अभी तक जेब मे दो चार ' कन्चे ' साथ रखते हैं
डॉ। उदय ' मणि '

8 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

बहु ख़ूब...

chandrabhan bhardwaj said...

khusi men bhi kahin ik dard ki halaki jhalak to hai,
bhara hai ghav per under abhi baki kasak to hai;
kisi ki yaad ka ab aur pukhta sakshya kya hoga,
nahayee aansuon men roj yah bhigi palak to hai.

Chandrabhan Bharwaj

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत खूब कहा आपने.. पसन्द आये आपके मुक्तक..

उम्मीद ही बाइसे तकलीफ़ होती है
यकीं जिसका हो वह अक्सर नहीं आता

Akshaya-mann said...

bahut umda likha hai aur sahi baat bhi hai........

mehek said...

bahut hi badhiya

kavitaprayas said...

eKavita par aapko discover kiya.. aapka style waqai bahut cool hai !

keep it up !
-Archana

kkyadav said...

अतिसुन्दर प्रस्तुति...बधाई !!

अभिनव said...

उदयजी क्या कह गए आप. बहुत ही ज्यादा बढ़िया. 'कंचे साथ रखते हैं' भाई वाह. उस दिन यही पंक्तियाँ पढ़कर आपको फ़ोन किया था और आज दुबारा ये मुक्तक सामने आ गया.