आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा


आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ............

जनकवि स्व .विपिन 'मणि '

Monday, December 15, 2008

स्नेह है या स्वार्थ की छाया कहीं

स्नेह है या स्वार्थ की छाया कहीं

और पैमाने सभी बेकार हैं
अन्य नापों के तो जड आधार हैं
सिर्फ़ अपने ही ह्रदय के नाप से
नाप सकते हम निखिल संसार ये
ह्रदय की गहराइयों को नाप ले
वो यंत्र ये विग्यान दे पाया नहीं
एक करुणा यंत्र से तुम नाप लो
स्नेह है या स्वार्थ की छाया कहीं

चिर दुखों की ठोकरों से चूर होकर
भूल कर इस जिन्दगी का दांव हारा
विश्व के आलोक के हित चमकने का
कह रहा आकाश से टूटा सितारा
गीत क्या गाऊं भला मुख खोल मैं
जबकि मेरे गीत ही तव राग हैं
आंसुओं से क्या बुझाऊं उर - जलन
जबकि अन्तस मे तुम्हारी आग है...

3 comments:

एस. बी. सिंह said...

बढिया , शुक्रिया।

नीरज गोस्वामी said...

गीत क्या गाऊं भला मुख खोल मैं
जबकि मेरे गीत ही तव राग हैं
आंसुओं से क्या बुझाऊं उर - जलन
जबकि अन्तस मे तुम्हारी आग है...
अद्भुत शब्द...वाह...
नीरज

डाकिया बाबू said...

गीत क्या गाऊं भला मुख खोल मैं
जबकि मेरे गीत ही तव राग हैं
आंसुओं से क्या बुझाऊं उर - जलन
जबकि अन्तस मे तुम्हारी आग है...
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बेहद सुंदर कविता. आपकी लेखनी में दम है.इस ब्लॉग पर आकर प्रसन्नता का अनुभव हुआ. कभी आप हमारे ब्लॉग पर भी आयें !!