आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा


आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ............

जनकवि स्व .विपिन 'मणि '

Saturday, December 13, 2008

दे दूं कुछ और अभी....

दे दूं कुछ और अभी

जीवन भर का सुमिरन
देकर भी करता मन
दे दूं कुछ और अभी

भक्ति - भाव अर्जन ले लो
शक्ति - साध सर्जन ले लो
अर्पित है अन्तर्तम
अहं का विसर्जन लो
जन्म लो - मरण ले लो
स्वप्न - जागरण ले लो
चिर संचित श्रम साधन
देकर भी करता मन
दे दूं कुछ और अभी

यह नाम तुम्हारा हो
धन- धाम तुम्हारा हो
मात्र कर्म मेरे हों
परिणाम तुम्हारा हो

उंगलियां सुमरनी हों
सांसे अनुकरनी हों
शश्वत -स्वर आत्मसुमन
देकर भी करता मन
दे दूं कुछ और अभी

5 comments:

Amit K. Sagar said...

बहुत ही उम्दा श्रीमान जी. जारी रहें.
---
शुभकामनाएं.
मेरे ब्लोग्स पर सादर आमंत्रित हैं.
--
मौजे-सागर

परमजीत बाली said...

बहुत ही बढ़िया व सुन्दर रचना है।बधाई।

यह नाम तुम्हारा हो
धन- धाम तुम्हारा हो
मात्र कर्म मेरे हों
परिणाम तुम्हारा हो

नीरज गोस्वामी said...

यह नाम तुम्हारा हो
धन- धाम तुम्हारा हो
मात्र कर्म मेरे हों
परिणाम तुम्हारा हो
बहुत कमाल के शब्द...विलक्षण रचना...वाह.
नीरज

अक्षय-मन said...

bahut hi khub likha hai bahut hi accha
......
kya baat hai sir ji ab ki baar to kamaal ka likha hai......

kabhi kabhi hamari tarf bhi aaiye....

अक्षय-मन

makrand said...

bahut umda